Tuesday, October 11, 2011

फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो

तुम मेरी जिंदगी हो....तुम मेरे हर पल मे हो .....
फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो......तुम मेरे दिन मे हो,मेरी रात मे हो...
फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो.....
मेरे खयालो मे तुम हो , मेरे ख्वाबो तुम हो ....
मेरी हर बात तुमसे है,जुड़े हर जज्बात तुमसे है....
फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो.....
सुना है की "रब" सबकी सुनता है...दिल से मांगी हर दुआ कबूल करता है.....
मंदिर,मज्जिद,गुरूद्वारे..... सिर्फ तुझको पाने के सजदे किये है....
फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो.....
 कहते है सभी की ""इश्क"" एक इबादत है... कहते है सभी की ""इश्क"" एक इबादत है...
सच है अगर ये तो...पूजा ही की हमने तेरी....तुझको अपना "'खुदा" मानकर....
फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो.....
 तेरे नाम से धडकनों का शोर बढ जाता है...तेरे ख्यालो से हर पल गुजर जाता है..... तुम नहीं मेरे आस-पास... फिर क्यों ये नज़रे,तुझको तलाशती है पल-पल.....ये क्या है जो तेरे "एहेसास" को मुझसे जुदा नहीं करता.... अगर है ये मोह्हबत... फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो.....फिर क्यों तुम मेरी नहीं हो.....

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