Wednesday, October 5, 2011

सब कुछ तो ""माँ "" है.....

जब पहचान न थी हमारी तब से जिसने जाना है हमे वो "माँ" है..... 
हमारी हर साँस को जिसने हर पल जिया है वो "माँ" है..... 
दुनिया की तकलीफ से "महफूज" रख जिसने खुद मे पाला है हमे वो "माँ" है..... 
कभी धुप से, कभी बारिश से..कभी सर्द जाड़ो की रातों से....
हर पल अपने आँचल मे छुपाया है वो "माँ" है.....  
आज भी हमे समझना सबके लिए आसान नहीं...
बिन बोले जिसने सबकुछ समझा वो "माँ" है..... 
कभी दोस्त, कभी बहन, कभी साथी... नारी के रूप है कई..
पर सबसे प्यारी वो "माँ" है..... 
बिन मांगे जो सबकुछ दे...बदले मे कुछ न ले....
जिसे हर दर्द का एहेसास ... जो हर पीड़ा को समझे ...
आपकी हर "दुआ" मे जिसकी "रजा" हो...
जो हर पल आपके लिए "दुआ" करे  वो "माँ" है..... 
हर ख़ुशी कम सी है....हर रिश्ता कम सा है.....
सबसे बढकर जो है  वो "माँ" है..... सब कुछ तो ""माँ "" है.....

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